पर्यावरण दिवस और पर्यावरणविद् नेता

पर्यावरण दिवस और पर्यावरणविद् नेता 

आज विश्व पर्यावरण दिवस है तमाम जगहों पर कई प्रकार के संगठन और राजनीतिक लोग दुनियां को दिखने के लिए पर्यावरण दिवस के नाम पर छोटे-छोटे पौधों की बली दे रहे हैं । जबकि हकीकत कुछ और ही है। ये तमाम प्रकार के लोग और संगठन सिर्फ आज दिखावा मात्र करते हैं । जिन पेड़ पौधों को ये लोग आज रोपते हैं उन्हे दुबारा कभी देखने भी नहीं जाते । यही असली सच है पर्यावरण दिवस का, जो लोग वास्तव में पर्यावरण के प्रति सजग हैं वो लोग बिना किसी हो हल्ला, पुरस्कारों और फोटो में कहीं नहीं दिखते वे सिर्फ वे सिर्फ अपने काम के साथ मस्त हैं, जबकि अक्सर पर्यावरणविद् को मैंने जंगलों की दलाली करते देखा है । 

बिगत कुछ वर्षों से देख रहा हूं हमारे देश में कई पर्यावरणविद् और नेता उभर कर आ रहे हैं जिनको एक पेड़ लगाने के लिए  हजारों में भीड़ चाहिए और मीडिया सोशल मीडिया का भी भरपूर साथ चाहिए । 
कुछ वर्ष पूर्व ही हमारे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने देहरादून की रिस्पना नदी में स्वच्छता को लेकर खूब ढिंडोरा पीटा लाखों पेड़ लगवाये करोडों के विज्ञापन छपवाए प्रदेश का खूब पैसे लुटाया खुद को रिस्पना का भगीरथ माना लेकिन हालात आज भी जस के तस है ना ही उन लोखों पेड़ में एक पेड़ लगा ना ही अभी तक रिस्पना स्वच्छ हो पाई लेकिन तमाम मीडिया संस्थानों को करोड़ो के विज्ञापन और नेता को फोटो खिंचवाने का मौका मिला ।

पहाड़ो में बढते चीड़ के पेड़ और घटता पानी चिंता का विषय 
पहोड़ो में विगत वर्षों से चीड़ के जंगल काफी हद तक बड़ रहे हैं जबकि बांज बुरांस के जंगल धीरे-धीरे घट रहे हैं । जिस कारण अधिकांश क्षेत्रों में पानी की काफी किल्लतें होने लग गई है । चीड़ जमीन से काफी पानी खींचता है जबकि बांज बुरांश के जंगलों से हमें काफी पानी मिलता है लेकिन आज के दौर में चीड़ की लकड़ी का प्रयोग इतना बढ़ गया की इसे हटाने को कोई भी तैयार नहीं ।
 ✒✒✒  स्वतंत्र पत्रकार @पंकज भट्ट

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